Sunday, January 20, 2013

Traditional water source "Dhara" & "Naula"

dhara
The ancient method of water conservation efforts led to the building of wells, ookhars, dharas, mangras, naulas, khaals, gools, tals and gharats in Uttarakhand. These stand out as examples of fine masonry work and stone architecture. Owing to their sheer storage capacity, these helped people survive through periods of droughts.
dhara
Natural water springs called dhara or mangra locally, with figures of the cow, elephant, lion and even Ganesha carved out at the outlet, that worked as taps dating back to the 10 century have also been found at Vaiterni in Gopeshwar (Chamoli). The oldest naula constructed to preserve ground water called the Jhanvi Naula at Gangolihat (Kumaon) was constructed in 1272 BC,”.
Most of these ancient water bodies that were used for drinking water supply were constructed either in the vicinity of temples or were assigned religious symbols or figures so that the sanctity of these bodies could be maintained.
Naulas
ancient water source "naula"
Naulas are life line of villages in uttaranchal. In Kumaon water harvesting and storage is given great importance. The traditional naulas or harvested springs are often beautifully made with sculptures. Many naulas are famous not only for the quality of their water but also for the architectural beauty. One observation on my recent trip was the introduction of handpumps throughout the region, especially along the roads.


ancient water source "naula"
This is a boon to tired travellers & villagers who often have to walk long distances to fetch water. This song comes to my mind...." Thando re Thando mere Pahad ki Hawa thandi, pani thando " (cool is the breeze that comes from my hills & cool is the water that flows thru it.

Kumaon Beauty बुरांस


बुरांस या बुरुंश (रोडोडेंड्रॉन / Rhododendron ) सुन्दर फूलों वाला एक वृक्ष है। बुरांस का पेड़ जहां उत्तराखंड का राज्य वृक्ष है, वहीं नेपाल में बुरांस के फूल को राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया है। गर्मियों के दिनों में ऊंची पहाडिय़ों पर खिलने वाले बुरांस के सूर्ख फूलों से पहाडिय़ां भर जाती हैं। हिमाचल प्रदेश में भी यह पैदा होता है।
हिमालयी क्षेत्रों में 1500 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाने वाला बुरांस मध्यम ऊंचाई पर पाया जाने वाला सदाबहार वृक्ष है। बुरांस के पेड़ों पर मार्च-अप्रैल माह में लाल सूर्ख रंग के फूल खिलते हैं। बुरांस के फूलों का इस्तेमाल दवाइयों में किया जाता है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में पेयजल स्त्रोतों को यथावत रखने में बुरांस महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बुरांस के फूलों से बना शरबत हृदय रोगियों के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है। बुरांस के फूलों की चटनी और शरबत बनाया जाता है, वहीं इसकी लकड़ी का इस्तेमाल कृषि यंत्रों के हैंडल बनाने में किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बुजुर्ग सीजऩ के दौरान घरों में बुरांस की चटनी बनवाना नहीं भूलते। बुरांस की चटनी ग्रामीण क्षेत्रों में काफी पसंद की जाती है।
परिचय
रोडोडेंड्राँन (Rhododendron), झाड़ी अथवा वृक्ष की ऊँचाईवाला पौधा है, जो एरिकेसिई कुल (Ericaceae) में रखा जाता है। इसकी लगभग 300 जातियाँ उत्तरी गोलार्ध की ठंडी जगहों में पाई जाती हैं। अपने वृक्ष की सुंदरता और सुंदर गुच्छेदार फूलों के कारण यह यूरोप की वाटिकाओं में बहुधा लगाया जाता है। भारत में रोडोडेंड्रॉन की कई जातियाँ पूर्वी हिमालय पर बहुतायत से उगती हैं। रोडोडेंड्रॉन आरबोरियम (Rorboreum) अपने सुंदर चमकदार गाढ़े लाल रंग के फूलों के लिए विख्यात है। पश्चिम हिमालय पर कुल चार जातियाँ इधर उधर बिखरी हुई, काफी ऊँचाई पर पाई जाती हैं। दक्षिण भारत में केवल एक जाति रोडोडेंड्रॉन निलगिरिकम (R. nilagiricum) नीलगिरि पर्वत पर पाई जाती है। चित्र. रोडोडेंड्रॉन अरबोनियम
इस वृक्ष की सुंदरता के कारण इसकी करीब 1,000 उद्यान नस्लें (horticultural forms) निकाली गई हैं। इसकी लकड़ी अधिकतर जलाने के काम आती है। कुछ अच्छी लकड़ियों से सुंदर अल्मारियाँ बनाई जाती हैं। फूल से एक प्रकार की जेली बनती है तथा पत्तियाँ ओषधि में प्रयुक्त होती हैं।

बुरांस की खेती
बुरांस के कृषिकरण में निम्नलिखित बातें ध्यान देने योग्य हैं -
जलवायुः अफ्रीका व दक्षिणी अमरीका को छोड़कर विश्व के सभी भागों में यह जंगली रूप से पाया जाता है। इसकी कुछ प्रजातियां दक्षिणी एवं दक्षिण पूर्वी एशिया में भी मिलती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि बुरांस नमीयुक्त शीतोष्ण क्षेत्रों में लगभग 11000 फुट की ऊंचाई तक उगाया जा सकता है।
मृदाः बुरांस के लिए अम्लीय मृदा, जिसका पीएच मान पांच या उससे कम हो, अच्छी रहती है। यद्यपि अगर मृदा का पीएच मान छह हो, तो भी अम्लीय खाद मिलाकर इसे उगाया जा सकता है। बुरांस का पेड़ रेतीली व पथरीली भूमि, जो जल्दी सूख जाए, में नहीं उगता।

पोषणः बुरांस में भोजन लेने वाली जड़ें मिट्टी की ऊपरी सतह पर होती हैं। अतः उन पर गर्मी और सूखे का दुष्प्रभाव जल्दी पड़ता है। पूर्ण रूप से सड़ी हुई गोबर की खाद अच्छी मात्रा में बिजाई से पहले पौधों में देनी चाहिए। मशरूम के उत्पाद अवशेष और मांस के उत्पाद अवशेष खाद के रूप में बुरांस के पेड़ में प्रयोग नहीं करने चाहिएं, क्योंकि इनमें चूने की मात्रा होती है, जो मिट्टी की अम्लीयता पर प्रभाव डालती है और अम्लीयता कम होने पर बुरांस के पत्ते पीले पड़ने लगते हैं।
प्रवर्द्धनः प्राकृतिक रूप से इसका प्रसारण बीज द्वारा होता है। जबकि साधारणतया कलम इसके प्रवर्द्धन का अच्छा माध्यम है।
बीजः बुरांस के पौधे ग्राफ्टिंग और शोभाकारी पौधों के प्रवर्द्धन में काम आते हैं। इसके बीज फलों के फटने से पहले एकत्रित किए जाते हैं। शरद ऋतु के अंत में या बसंत ऋतु से पहले ग्रीन हाउस या पोलीटनल में बीज बोए जाते हैं। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए बालू और पीट के ऊपर मॉस घास की एक परत बिछानी चाहिए और तापमान 15-21 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। बीज को अंकुरण से रोपाई अवस्था में आने में तीन महीने लग जाते हैं।
कलमः जड़ कलम बुरांस के प्रवर्द्धन का मुख्य तरीका है। तना कलम भी मातृ पौधे से गर्मियों में ली जाती है। कलम में जल्दी जड़ निकलने के लिए इसके आधार पर छोटे-छोटे घाव करने चाहिएं। जबकि जड़ें ग्रीनहाउस में मिस्ट के अंदर जल्दी निकल जाती हैं। कलम से तैयार पौधे जल्दी बढ़ते हैं।
ग्राफ्टिंगः विनियर ग्राफ्टिंग इसकी सबसे अच्छी तकनीक है। ग्राफ्टिंग के अच्छे परिणाम के लिए अधिक नमी और 21 डिग्री सेल्सियस तापमान उचित है।

Saturday, January 19, 2013

घंटयाली माता, जो करती हैं सीमाओं की रक्षा


1965 में हुए भारत पाकिस्तान युद्ध में पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना को परास्त करने तनोट माता की भूमिका बड़ी अहम मानी जाती है। यहां तक मान्यता है कि माता ने सैनिकों की मदद की और पाकिस्तानी सेना को पीछे हटना पड़ा। इस घटना की याद में तनोट माता मंदिर के संग्रहालय में आज भी पाकिस्तान द्वारा फेंके गये जीवित बम रखे गये हैं। 

तनोट माता की तरह ही इस क्षेत्र में घंटयाली माता की ख्याति है। घंटयाली माता ने भी सैनिकों की सहायता की थी और तनोट माता की तरह ही इनके परिसर में भी दागे गये गोले और बम फटे नहीं। यही कारण है कि भारतीय सैनिक इन मंदिरों के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। घंटयाली माता मंदिर में सुबह शाम की पूजा भी सैनिक ही करते हैं। आस-पास के क्षेत्र में घंटयाली माता की बड़ी ख्याति है, लोग यहां अपनी मुरादें मांगने भी आते हैं। 

मान्यता है कि माता सदैव अपने मंदिर में निवास करती हैं और अपने भक्तों की पुकार सुनती हैं। घंटयाली माता की एक प्राचीन कथा है जो मंदिर की दीवार पर लिखी हुई है। कथा के अनुसार सीमावर्ती गांवों के लोगों पर कुछ लोगों ने अत्याचार करना शुरू कर दिया। गांव के एक परिवार के सभी सदस्यों को अपराधियों ने मार दिया। संयोगवश एक महिला जीवित रह गयी और गांव छोड़कर अन्य स्थान पर चली गयी। 

इस दौरान महिला गर्भवती थी और कुछ समय बाद इसने एक पुत्र को जन्म दिया। बड़ा होने पर मां ने अपने पुत्र को सारी घटना बतायी। अपने परिवार वालों पर हुए अत्याचार के बारे में जानकर लड़के ने अत्याचारियों से बदला लेने की ठान ली। यह तलवार लेकर अपने पैतृक गांव लौट आया। रास्ते में घंटयाली माता का मंदिर मिला। यहां माता ने एक छोटी बच्ची के रूप में लड़के को दर्शन दिया और पानी पिलाया। माता ने कहा कि तुम बस एक व्यक्ति को मारना बाकि सब अपने आप मर जाएंगे। 

लड़के ने कहा कि यदि ऐसा हो जाएगा तो मैं वापस लौटकर अपना सिर आपके चरणों में चढ़ा दूंगा। माता के आदेश के अनुसार लड़का गांव में पहुंचा तो देखा कि एक बारात जा रही है। उसने पीछे से एक व्यक्ति को मार दिया। इसके बाद सभी लोग आपस में उलझ गये और एक-दूसरे को मारने लगे। लड़का लौटते समय माता के मंदिर में गया और माता को पुकारने लगा। माता प्रकट नहीं हुई तब लड़का अपना सिर काटकर माता के चरणों में रखने के लिए तलवार उठा लिया। 

इसी समय माता प्रकट हुई और लड़के का हाथ पकड़ कर बोली 'मैं तो यहीं विराजमान हूं, मैं अपने भक्तों को दर्शन देकर आगे भी कृतार्थ करती रहूंगी।' इस घटना के बाद से पूरे क्षेत्र में घंटयाली माता की प्रसिद्धि फैल गयी।

मेले में खूब बिक रहा हिमालय की जंबू, गंदरायण


उच्च हिमालयी इलाकों की जंबू, गंदरायण तथा अन्य औैषधीय सामग्री की गुणवत्ता आज भी लोगों को अपनी खींच रही हैै। उत्तरायणी मेले में यह वस्तुएं खूब बिकने के लिए आती हैं। मुनस्यारी की लाजवाब राजमा और बर्फीले इलाकों में पैदा होने वाली मूली के चिप्स भी लोगों को लुभा रहे हैं। 
हिमालयी इलाकों में पैदा होने वाली कीमती जड़ी-बूटियां सदियों से परंपरागत मेलाें के जरिए मध्य हिमालय, तराई और मैदानी इलाकाें तक जाती रही हैं। पिथौरागढ के धारचूला, मुनस्यारी आदि क्षेत्रों के व्यापारी हर साल उत्तरायणी के मेले में यह वस्तुएं बेचने के लिए आते हैं। इस साल भी फड़ लगाए गए हैं। धारचूला के बोन गांव निवासी किसन बोनाल ने बताया कि जंबू की तासीर गर्म होती है। इसे दाल में डाला जाता है। गंदरायण भी बेहतरीन दाल मसाला है और पेट तथा पाचन तंत्र के लिए उपयोगी है। कुटकी बुखार, पीलिया, मधुमेह और निमोनिया में, डोलू गुम चोट में, मलेठी खांसी में, अतीस पेट दर्द में, सालम पंजा दुर्बलता में लाभ दायक होता है। उत्तरायणी मेले में गंदरायण, डोलू, मलेठी आदि दस रुपये तोला, जंबू 20 रुपये, कुटकी 30 रुपये तोला के हिसाब से बिक रहा है। इनके अलावा भोज पत्र, रतन जोत सहित कई प्रकार की जड़ी बूटियां शामिल हैं। मुनस्यारी की राजमा खाने में स्वादिष्ट होती है और जल्दी पक जाती है। राजमा 140 और 160 रुपये किलो से ऊपर बिक रही है। 

हिमालयी क्षेत्र में 10 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर पैदा होने वाली मूली के चिप्स भी वहां आए हैं। व्यवसायियों ने बताया कि मूली के यह चिप्स बर्फ की हवा में सुखाए जाते हैं। इनकी सब्जी स्वादिष्ट और स्वास्थ्य वर्धक होती है तथा पेट की कब्ज और म्यूकस दूर करती है। व्यवसायियों का कहना है कि अनियंत्रित दोहन के कारण जड़ी-बूटियाें का प्राकृतिक उत्पादन कम होने से उपलब्धता प्रभावित हुई है। वह खेतों में उत्पादन करके बेचते हैं। इसके बावजूद इन्हें लाने ले जाने में पुलिस और वन महकमा परेशान करता है।