Monday, February 04, 2013

Kumaon Mastiff सिप्रो कुकुर


Kumaon Mastiff or Cypro Kukur ( Kumauni - सिप्रो कुकुर), is a rare breed of dog originating in India. Originally bred as a watch dog in the hills of Kumaon this dog is today a rare, even in the region of its origin.

Origin
It is said that the dogs primitive ancestors were domiciled in the Mediterranean region - the name Cypro Kukur literally means Cyprus Dog in Kumauni and is believed introduced in Kumaon by settlers where it was bred by locals as a watch dog. Although no evidence isther which suggests that the breed originated in Cyprus, except the name. Folklore suggests it was introduced by Alexander the Great's soldiers in 300 B.C. when he invaded India.
Appearance
Cypro kukur is a large dog with fairly lean, muscular, well-boned bodies. They have a large powerful head and a strong neck . They have a short, soft coat that always comes in brindle, ranging from dark to light shades. They may also have white markings. The average height of these dogs is 28 inches.
Their appearance has been described to be similar to old Great Danes.
Temperament
They are aggressive dogs and need training.
Enadangered Breed
It is estimated that only 150-200 heads of this breed exist in its country of origin  
Greater population of these dogs may be present in Europe, particularly in Italy and Finland, where it was introduced by breeders who took the breed to Europe in the late 19th century. 

Sunday, February 03, 2013

शैलेश मटियानी ( रमेशचंद्र सिंह मटियानी)


शैलेश मटियानी (१४ अक्तूबर १९३१-२४ अप्रैल २००१) आधुनिक हिंदी साहित्य में नई कहानी आंदोलन के दौर के एवं उससे जुड़े हुए प्रसिद्ध गद्यकार हैं। उन्होंने मुठभेड़, बोरीबली से बंबई जैसे उपन्यास, चील, अर्धांगीनी जैसी कहानियों के साथ ही अनेक निबंध और संस्मरण भी लिखे हैं। संकलित हैं।
जीवन वृत्त
उनका जन्म बाड़ेछीना गांव (जिला अलमोड़ा, उत्तराखंड (भारत)) में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। बारह वर्ष (१९४३) की अवस्था में उनके माता-पिता का देहांत हो गया। उस समय वे पांचवीं कक्षा के छात्र थे। इसके बाद वे अपने चाचाओं के संरक्षण में रहे किंतु उनकी पढ़ाई रुक गई। उन्हें बूचड़खाने तथा जुए की नाल उघाने का काम करना पड़ा। पांच साल बाद 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने फिर से पढ़ना शुरु किया। विकट परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। वे १९५१ में अल्मोड़ा से दिल्ली आ गए। यहाँ वे 'अमर कहानी' के संपादक, आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रहने लगे। तबतक 'अमर कहानी' और 'रंगमहल' से उनकी कहानी प्रकाशित हो चुकी थी। इसके बाद वे इलाहाबाद गए। उन्होंने मुज़फ़्फ़र नगर में भी काम किया। दिल्ली आकर कुछ समय रहने के बाद वे बंबई चले गए। फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें कई कठिन अनुभवों से गुजरना पड़ा। १९५६ में श्रीकृष्ण पुरी हाउस में काम मिला जहाँ वे अगले साढ़े तीन साल तक रहे और अपना लेखन जारी रखा। बंबई से फिर अल्मोड़ा और दिल्ली होते हुए वे इलाहाबाद आ गए और कई वर्षों तक वहीं रहे। 1992 में छोटे पुत्र की मृत्यु के बाद उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। जीवन के अंतिम वर्षों में वे हल्द्वानी आ गए। विक्षिप्तता की स्थिति में उनकी मृत्यु दिल्ली के शहादरा अस्पताल में हुई।
रचना कर्म
१९५० से ही उन्होंने कविताएं और कहानियां लिखनी शुरू कर दी थी। शुरु में वे रमेश मटियानी 'शैलेश' नाम से लिखते थे। उनकी आरंभिक कहानियां 'रंगमहल' और 'अमर कहानी' पत्रिका में प्रकाशित हुई। उन्होंने 'अमर कहानी' के लिए 'शक्ति ही जीवन है' (१९५१) और 'दोराहा' (१९५१) नामक लघु उपन्यास भी लिखा। उनका पहला कहानी संग्रह 'मेरी तैंतीस कहानियां'१९६१ में प्रकाशित हुआ। उनकी कहानियों में 'डब्बू मलंग', 'रहमतुल्ला', 'पोस्टमैन', 'प्यास और पत्थर', 'दो दुखों का एक सुख' (1966), 'चील', 'अर्द्धांगिनी', ' जुलूस', 'महाभोज', 'भविष्य', और 'मिट्टी' आदि विशेष उल्लेखनीय है। कहानी के साथ ही उन्होंने कई प्रसिद्ध उपन्यास भी लिखा। उनके कई निबंध संग्रह एवं संस्मरण भी प्रकाशित हुए। उन्होंने 'विकल्प' और 'जनपक्ष' नामक दो पत्रिकाएँ निकाली। उनके पत्र 'लेखक और संवेदना'(१९८३) में संकलित हैं।

कहानी संग्रह
'दो दुखों का एक सुख'(१९६६)
'नाच जमूरे नाच',
'हारा हुआ',
'जंगल में मंगल'(१९७५),
'महाभोज'(१९७५),
'चील' (१९७६),
'प्यास
पत्थर'(१९८२),
'बर्फ की चट्टानें'(१९९०)
'सुहागिनी तथा अन्य कहानियां'(१९६७),
'पाप मुक्ति तथा अन्य कहानियां'(१९७३),
'माता तथा अन्य कहानियां'(१९९३),
'अतीत तथा अन्य कहानियां',
'भविष्य तथा अन्य कहानियां',
'अहिंसा तथा अन्य कहानियां',
'भेंड़े और गड़ेरिए'
उपन्यास
'हौलदार'(१९६१),
'चिट्‌ठी रसेन'(१९६१),
'मुख सरोवर के हंस',
'एक मूठ सरसों'(१९६२),
'बेला हुई अबेर'(१९६२),
'गोपुली गफूरन'(१९६२),
'नागवल्लरी', 'आकाश कितना अनंत है'
'बोरीबली से बोरीबंदर',
'भागे हुए लोग',
'मुठभेड़'(१९९३),
'चंद औरतों का शहर'(१९९२)
'किस्सा नर्मदा बेन गंगू बाई',
'सावित्री',
'छोटे-छोटे पक्षी',
'बावन नदियों का संगम',
'बर्फ गिर चुकने के बाद',
'कबूतरखाना'(१९६०),
'माया सरोवर' (१९८७)
'रामकली* '

 निबंध और संस्मरण
'मुख्य धारा का सवाल' ,
'कागज की नाव'(१९९१),
'राष्ट्रभाषा का सवाल' ,
'यदा कदा',
'लेखक की हैसियत से' ,
'किसके राम कैसे राम'( १९९९),
'जनता और साहित्य' (१९७६),
'यथा प्रसंग' ,
'कभी-कभार'(१९९३) ,
'राष्ट्रीयता की चुनौतियां'(१९९७)
'किसे पता है राष्ट्रीय शर्म का मतलब'(१९९५)

 पुरस्कार 
१९९२ में कुमाऊं विश्वविद्यालय ने डी० लिट० की मानद उपाधि से सम्मानित किया।
1984 में मुठभेड़ उपन्यास के लिए फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार प्रदान किया गया।
उत्तर प्रदेश सरकार का संस्थागत सम्मान,
शारदा सम्मान
देवरिया केडिया सम्मान
साधना सम्मान
लोहिया सम्मान

Saturday, February 02, 2013

कुमायूं रामलीला नाटक मंचन


भगवान राम की कथा पर आधारित रामलीला नाटक के मंचन की परंपरा भारत में युगों से चली आयी है। लोक नाट्य के रुप में प्रचलित इस रामलीला का देश के विविध प्रान्तों में अलग अलग तरीकों से मंचन किया जाता है। उत्तराखण्ड खासकर कुमायूं अंचल में रामलीला मुख्यतया गीत-नाट्य शैली में प्रस्तुत की जाती है। वस्तुतः पूर्व में यहां की रामलीला विशुद्व मौखिक परंपरा पर आधारित थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोक मानस में रचती-बसती रही। शास्त्रीय संगीत के तमाम पक्षों का ज्ञान न होते हुए भी लोग सुनकर ही इन पर आधारित गीतों को सहजता से याद कर लेते थे। पूर्व में तब आज के समान सुविधाएं न के बराबर थीं स्थानीय बुजुर्ग लोगों के अनुसार उस समय की रामलीला मशाल, लालटेन व पैट्रोमैक्स की रोशनी में मंचित की जाती थी। कुमायूं में रामलीला नाटक के मंचन की शुरुआत अठारहवीं सदी के मध्यकाल के बाद हो चुकी थी। बताया जाता है कि कुमायूं में पहली रामलीला 1860 में अल्मोड़ा नगर के बद्रेश्वर मन्दिर में हुई। जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलैक्टर स्व० देवीदत्त जोशी को जाता है। बाद में नैनीताल, बागेश्वर व पिथौरागढ़ में क्रमशः 1880, 1890 व 1902 में रामलीला नाटक का मंचन प्रारम्भ हुआ। अल्मोड़ा नगर में 1940-41 में विख्यात नृत्य सम्राट पं० उदय शंकर ने छाया चित्रों के माध्यम से रामलीला में नवीनता लाने का प्रयास किया। हांलाकि पं० उदय शंकर द्वारा प्रस्तुत रामलीला यहां की परंपरागत रामलीला से कई मायनों में भिन्न थी लेकिन उनके छायाभिनय, उत्कृष्ट संगीत व नृत्य की छाप यहां की रामलीला पर अवश्य पड़ी। 

कुमायूं की रामलीला में बोले जाने वाले सम्वादों, धुन, लय, ताल व सुरों में पारसी थियेटर की छाप दिखायी देती है, साथ ही साथ ब्रज के लोक गीतों और नौटंकी की झलक भी। सम्वादों में आकर्षण व प्रभावोत्पादकता लाने के लिये कहीं-कहीं पर नेपाली भाषा व उर्दू की गजल का सम्मिश्रण भी हुआ है। कुमायूं की रामलीला में सम्वादों में स्थानीय बोलचाल के सरल शब्दों का भी प्रयोग होता है। रावण कुल के दृश्यों में होने वाले नृत्य व गीतों में अधिकांशतः कुमायूंनी शैली का प्रयोग किया जाता है। रामलीला के गेय संवादो में प्रयुक्त गीत दादर, कहरुवा, चांचर व रुपक तालों में निबद्ध रहते हैं। हारमोनियम की सुरीली धुन और तबले की गमकती गूंज में पात्रों का गायन कर्णप्रिय लगता है। संवादो में रामचरित मानस के दोहों व चौपाईयों के अलावा कई जगहों पर गद्य रुप में संवादों का प्रयोग होता है। यहां की रामलीला में गायन को अभिनय की अपेक्षा अधिक तरजीह दी जाती है। रामलीला में वाचक अभिनय अधिक होता है, जिसमें पात्र एक ही स्थान पर खडे़ होकर हाव- भाव प्रदर्शित कर गायन करते हैं। नाटक मंचन के दौरान नेपथ्य से गायन भी होता है। विविध दृश्यों में आकाशवाणी की उदघोषणा भी की जाती है। रामलीला प्रारम्भ होने के पूर्व सामूहिक स्वर में रामवन्दना “श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन“ का गायन किया जाता है। नाटक मंचन में दृश्य परिवर्तन के दौरान जो समय खाली रहता है उसमें विदूशक (जोकर) अपने हास्य गीतों व अभिनय से रामलीला के दर्शकों का मनोरंजन भी करता है। कुमायूं की रामलीला की एक अन्य खास विशेषता यह भी है कि इसमें अभिनय करने वाले सभी पात्र पुरुष होते हैं। आधुनिक बदलाव में अब कुछ जगह की रामलीलाओं में कोरस गायन, नृत्य के अलावा कुछ महिला पात्रों में लड़कियों को भी शामिल किया जाने लगा है।

कुमाऊ अंचल में रामलीला मंचन की तैयारियां एक दो माह पूर्व (अधिकांशतः जन्माष्टमी के दिन) से होनी शुरु हो जाती हैं। तालीम मास्टर द्वारा सम्वाद, अभिनय, गायन व नृत्य का अभ्यास कराया जाता है। लकड़ी के खम्भों व तख्तों से रामलीला का मंच तैयार किया जाता है। कुछ स्थानों पर तो अब रामलीला के स्थायी मंच भी बन गये हैं। शारदीय नवरात्र के पहले दिन से रामलीला का मंचन प्रारम्भ हो जाता है, जो दशहरे अथवा उसके एक दो दिन बाद तक चलता है। इस दौरान राम जन्म से लेकर रामजी के राजतिलक तक उनकी विविध लीलाओं का मंचन किया जाता है। कुमायूं अंचल की रामलीला में सीता स्वयंवर,परशुराम-लक्ष्मण संवाद, दशरथ-कैकयी संवाद, सुमन्त का राम से आग्रह, सीताहरण, लक्ष्मण शक्ति, अंगद-रावण संवाद, मन्दोदरी-रावण संवाद व राम-रावण युद्ध के प्रसंग मुख्य आर्कषण होते हैं। इस सम्पूर्ण रामलीला नाटक में तकरीबन साठ से अधिक पात्रों द्वारा अभिनय किया जाता है। कुमायूं की रामलीला में राम, रावण, हनुमान व दशरथ के अलावा अन्य पात्रों में परशुराम, सुमन्त, सूपर्णखा, जटायु, निशादराज, अंगद, शबरी, मन्थरा व मेघनाथ के अभिनय देखने लायक होते हैं। यहां की रामलीला में प्रयुक्त परदे, वस्त्र, श्रृंगार सामग्री व आभषूण प्रायः मथुरा शैली के होते हैं। नगरीय क्षेत्रों की रामलीला को आकर्षक बनाने में नवीनतम तकनीक, साजसज्जा, रोशनी,व ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग होने लगा है।

कुमायूं अंचल में रामलीला का मंचन अधिकांशतः शारदीय नवरात्र में किया जाता है, लेकिन जाड़े अथवा खेती के काम की अधिकता के कारण कहीं-कहीं गर्मियों व दीपावली के आसपास भी रामलीला का मंचन किया जाता है। 14 वर्ष तक लगातार रामलीला मंचन होने के बाद १४ वें साल में लव-कुश काण्ड का मंचन भी किये जाने की परम्परा इस अंचल में है। कुमायूं अंचल में रामलीला मंचन की यह परम्परा अल्मोड़ा से विकसित होकर बाद में आस-पास के अनेक स्थानों में चलन में आयी। शुरुआती दौर में चम्पावत, नैनीताल, पिथौरागढ, लोहाघाट, बागेश्वर, रानीखेत, भवाली, भीमताल, रामनगर हल्द्वानी मे सुरू हुई. पिछले कुछ वर्षो से काशीपुर के अलावा खटीमा, सितारगंज समेत आस पास कई सहरो मे भी पहाड़ी प्रवासियों द्वारा रामलीलाओ का आयोजन किया जा रहा है. उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक नगर अल्मोड़ा में आज भी तकरीबन आठ-दस मुहल्लों में बड़े उत्साह के साथ रामलीलाओं का आयोजन किया जाता है, जिनमें स्थानीय गांवों व नगर की जनता देर रात तक रामलीला का भरपूर आनन्द उठाती हैं। अल्मोड़ा नगर में लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब) की रामलीला का आकर्षण कुछ अलग ही होता है। दशहरे के दिन नगर में रावण परिवार के डेढ़ दर्जन के करीब आकर्षक पुतलों को पूरे बाजार में घुमाया जाता है। इन पुतलों को देखने के लिये नगर में भारी भीड़ एकत्रित होती है। 

कुमायूं अंचल की रामलीला को आगे बढ़ाने में पूर्व में जहां स्व० पं० रामदत्त जोशी, ज्योर्तिविद, स्व० बद्रीदत्त जोशी, स्व० कुन्दनलान साह, स्व० नन्दकिशोर जोशी, स्व० बांकेलाल साह, व स्व० ब्रजेन्द्रलाल साह सहित कई दिवंगत व्यक्तियों व कलाकारों का योगदान रहा, स्व० ब्रजेन्द्र लाल शाह जी ने रामलीला को आंचलिक बनाने के उद्देश्य से कुमांऊनी तथा गढ़वाली बोली में भी रामलीला को रुपान्तरित किया था।वहीं वर्तमान में लक्ष्मी भंडार( हुक्का क्लब) के श्री शिवचरण पाण्डे और उनके सहयोगी तथा हल्द्वानी के डॉ० पंकज उप्रेती सहित तमाम व्यक्ति, रंगकर्मी व कलाकार यहां की समृद्ध एवं परम्परागत रामलीला को सहेजने और संवारने के कार्य में लगे हुए हैं। वर्तमान में उत्तराखण्ड के लगभग हर गांव में रामलीलाओं का मंचन किया जाता है, जिनमें उत्तराखण्ड की इस समृद्ध परम्परा को सहेजने का प्रयास जारी है।

Thursday, January 31, 2013

खतड़ुआ

उत्तराखण्ड में प्रारम्भ से ही कृषि और पशुपालन आजीविका का मुख्य स्रोत रहा है। जटिल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण व्यापार की संभावनाएं नगण्य थीं, लेकिन कम उपजाऊ जमीन होने के बावजूद कृषि और पशुपालन ही जीवनयापन के प्रमुख आधार थे। आज भी कृषि और पशुपालन से सम्बन्धित कई पारम्परिक लोक परम्पराएं और तीज-त्यौहार पहाड़ के ग्रामीण अंचलों में जीवित हैं। इन त्यौहारों में हरियाली और बीजों से सम्बन्धित त्यौहार “हरेला” है, पिथौरागढ में मनाया जाने वाला “हिलजात्रा” एक ऐसा पर्व है, जिसमें कृषि-पशुपालन को विशिष्ट मुखौटों और नृत्यों के साथ मैदान में प्रदर्शित किया जाता है। पशुधन की प्रचुरता का लुत्फ उठाने का त्यौहार घी-त्यार के रुप में मनाया जाता है, इसी प्रकार से दीपावली के दो दिन के बाद होने वाले “गोवर्धन पूजा” पर गाय-भैंस व बैलों को सजाया जाता है, जो पर्वतीय अंचल के लोगों के पशुप्रेम और उनके प्रति उत्तरदायित्व को दर्शाता है। इसी प्रकार से भादों (भाद्रपद) के महीने में मनाया जाने वाला “खतड़ुवा” पर्व भी मूलत: पशुओं की मंगलकामना के लिये मनाया जाने वाला पर्व है। कुछ राजनीतिक प्रपंचों और बंटवारे की भावना वाले लोगों ने इस त्यौहार के साथ कई मनगढन्त किस्से जोड़ दिये हैं। जिससे इस पर्व को मनाने का मूल उद्देश्य पीछे छूटता जा रहा है।

खतड़ुआ शब्द की उत्पत्ति “खातड़” या “खातड़ि” शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है रजाई या अन्य गरम कपड़े. गौरतलब है कि भाद्रपद की शुरुआत (सितम्बर मध्य) से पहाड़ों में जाड़ा धीरे-धीरे शुरु हो जाता है। यही वक्त है जब पहाड़ के लोग पिछली गर्मियों के बाद प्रयोग में नहीं लाये गये कपड़ों को निकाल कर धूप में सुखाते हैं और पहनना शुरू करते हैं. इस तरह यह त्यौहार वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद शीत ऋतु के आगमन का परिचायक है। इस त्यौहार के दिन गांवों में लोग अपने पशुओं के गोठ (गौशाला) को विशेष रूप से साफ करते हैं. पशुओं को नहला-धुला कर उनकी खास सफाई की जाती है और उन्हें पकवान बनाकर खिलाया जाता है। पशुओं के गोठ में मुलायम घास बिखेर दी जाती है. शीत ऋतु में हरी घास का अभाव हो जाता है, इसलिये “खतड़ुवा” के दिन पशुओं को भरपेट हरी घास खिलायी जाती है. शाम के समय घर की महिलाएं खतड़ुवा (एक छोटी मशाल) जलाकर उससे गौशाला के अन्दर लगे मकड़ी के जाले वगैरह साफ करती हैं और पूरे गौशाला के अन्दर इस मशाल (खतड़ुवा) को बार-बार घुमाया जाता है और भगवान से कामना की जाती है कि वो इन पशुओं को दुख-बीमारी से सदैव दूर रखें।  गांव के बच्चे किसी चौराहे पर जलाने लायक लकड़ियों का एक बड़ा ढेर लगाते हैं गौशाला के अन्दर से मशाल लेकर महिलाएं भी इस ,चौराहे पर पहुंचती हैं और इस लकड़ियों के ढेर में “खतड़ुआ” समर्पित किये जाते हैं। ढेर को पशुओं को लगने वाली बिमारियों का प्रतीक मानकर “बुढी” जलायी जाती है. यह “बुढी” गाय-भैंस और बैल जैसे पशुओं को लगने वाली बीमारियों का प्रतीक मानी जाती हैं, जिनमें खुरपका और मुंहपका मुख्य हैं. इस चौराहे या ऊंची जगह पर आकर सभी खतड़ुआ जलती बुढी में डाल दिये जाते हैं और बच्चे जोर-जोर से चिल्लाते हुए गाते हैं-

भैल्लो जी भैल्लो, भैल्लो खतडुवा,
गै की जीत, खतडुवै की हार
भाग खतड़ुवा भाग

अर्थात गाय की जीत हो और खतड़ुआ (पशुधन को लगने वाली बिमारियों) की हार हो।

अमरकोश पढ़ी, इतिहास पन्ना पलटीं, खतड़सिंग न मिल, गैड़ नि मिल।इसके साथ ही बच्चे पड़ोस के गांववालों को ऊंची आवाजों में उनकी गाय-भैंसों को लगने वाली बीमारियां अपने घर ले जाने के लिये भी आमन्त्रित करते हैं। इस अवसर पर हल्का-फुल्का आमोद-प्रमोद होता है और ककड़ी को प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है. इस तरह से यह त्यौहार पशुधन को स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट बने रहने की कामना के साथ समाप्त होता है। इस महत्वपूर्ण पर्व के सम्बन्ध में पिछले दशकों से कुछ भ्रान्तियां फैलायी जा रही हैं। एक तर्कहीन मान्यता के अनुसार कुमाऊं के सेनापति गैड़ सिंह ने गढवाल के खतड़ सिंग (खतड़ुवा) सेनापति को हराया था, उसके बाद यह त्यौहार शुरू हुआ. लेकिन अब जबकि लगभग सभी इतिहासकार वर्तमान उत्तराखण्ड के इतिहास में गैड़ सिंह या खतड़ सिंह जैसे व्यक्तित्व की उपस्थिति और इस युद्ध की सच्चाई को नकार चुके हैं तो इन सब कुतर्कों पर बहस करना मूर्खता ही माना जायेगा। इस काल्पनिक युद्ध की घटना का उल्लेख गढवाल या कुमाऊं के किसी ऐतिहासिक वर्णन में नही है। कुमाऊंनी के प्रसिद्ध कवि श्री बंशीधर पाठक “जिज्ञासु” की कविता की कुछ पंक्तियां इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय हैं.-

कथ्यार पुछिन, पुछ्यार पुछिन, गणत करै, जागर लगै,
बैसि भैट्य़ुं, रमौल सुणों, भारत सुणों, खतड़सिंग नि मिल, गैड़ नि मिल,
स्याल्दे-बिखौती गयूं, देविधुरै बग्वाल गयूं, जागसर गयूं, बागसर गयूं,
अलम्वाड़ कि नन्दादेवी गयूं, खतड़सिंग नि मिल, गैड़ नि मिल।

यह भी सोचनीय विषय है कि पूरे विश्व के इतिहास में आज तक कोई ऐसा युद्ध नहीं हुआ, जिसमें जीत या हार का श्रेय किसी सेनापति को दिया गया हो। हमेशा ही युद्ध की जीत या हार का श्रेय सिर्फ और सिर्फ राजा को ही  मिला है। दूसरा पक्ष यह भी है कि उत्तराखण्ड का सबसे प्रमाणिक इतिहास एटकिन्सन के गजेटियर को माना जाता है, क्योंकि उसने ही पूरे उत्तराखण्ड में घूमकर इसकी रचना की थी। यदि ऐसा कुछ होता तो उन्होंने इसका भी वर्णन जरुर किया होता। इसलिये अब जरूरत है कि हम अपनी समृद्ध धरोहरों के रूप में चले आ रहे खतड़ुआ जैसे अन्य पर्वों को उनमें निहित सकारात्मक सन्देश के साथ मनायें और उनसे जुड़ी भ्रान्तियों को यथाशीघ्र मिटाते चलें जायें, जिससे आने वाली पीढियां भी इन परम्पराओं और लोकपर्वों को खुले मन से मना पायें। 

लेखक- श्री हेम पन्त